छठ पूजा का इतिहास एवं व्रत विधि

छठ पूजा का इतिहास (History of Chhath Puja in Hindi): भारत एक ऐसा देश है जिसे त्योहारों की भूमी कहा जाता है. जितने पर्व भारत में मनाये जाते हैं सायद ही किसी और देश में इतने पर्व मनाये जाते होंगे. पर्व और त्योहारों का सिलसिला भारत में साल भर चलता रहता है जिसकी एक लम्बी सूचि है इन्ही पर्वों में से एक ख़ास पर्व है छठ पूजा. इस लेख में मै आपको छठ पूजा से जुडी कुछ महत्वपूर्ण बातें बताने वाली हूँ.

कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाये जाने वाले छठ पर्व हिन्दुओं के महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है. प्रति वर्ष दीपावली के बाद छठ महापर्व का अनुष्ठान कीया जाता है. यह पर्व भगवान सूर्य के प्रति श्रद्धा और समर्पण दिखाता है. इस महापर्व में सूर्य नारायण के साथ देवी षष्टी की पूजा भी की जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी उषा को छठी मैया कहा जाता है. उषा का अर्थ होता है “दिन की पहली रौशनी”. उनकी पूजा छठ के दिन मोक्ष की प्राप्ति और मुश्किलों के हल करने की कामना करने के लिए की जाती है.

छठ पूजा का पर्व चार दिनों का अत्यंत कठिन और महत्वपूर्ण महापर्व होता है, इसका आरंभ कार्तिक शुक्ल की चतुर्थी से लेकर सप्तमी तक चलता है. इस त्यौहार को भारत के बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में मनाया जाता है इसके अलावा भारत के पड़ोसी मुल्क नेपाल में भी इसे हर्षौल्लास एवं निष्ठां के साथ मनाया जाता है.

छठ पूजा का इतिहास (History of Chhath Puja in Hindi)

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छठ पूजा से सम्बंधित बहुत से पौराणिक एवं लोक कथाएँ है जिन्हें जानकर आपको ये पता चल जायेगा की छठ पूजा क्यों मनाया जाता है

1. एक पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान् राम सूर्यवंशी थे जिनके कुल देवता सूर्य देव थे. रावन वध के बाद जब राम और सीता अयोध्या लौंटने लगे तो पहले उन्होंने सरयू नदी के तट पर अपने कुल देवता सूर्य की उपासना की और व्रत रखकर डूबते सूरज की पूजा की. यह तिथि कार्तिक शुक्ल की षष्ठी थी. अपने भगवान् को देखकर वहां की प्रजा ने भी यह पूजन आरम्भ कर दिया. ऐसा माना जाता है की तबसे छठ पूजा की शुरुआत हुयी.

2. एक और पौराणिक कथा के अनुसार छठ पूजा मनाने की शुरुआत महाभारत काल से मानी जाती है. कथा के अनुसार अंगराज कर्ण सूर्य पुत्र होने के साथ साथ सूर्य के उपासक भी थे. वे रोजाना नदी में जाकर सूर्य की अराधना किया करते थे. महाभारत के अनुसार कर्ण को उसके मित्र दुर्योधन द्वारा अंग देश का राजा बनाया गया जिसे आज के बिहार में स्थित भागलपुर के नाम से जाना जाता है. ऐसा कहा जाता है की कर्ण षष्ठी और सप्तमी के दिन सूर्य की विशेष पूजा करते थे साथ ही मांगने आये याचकों की इच्छा भी पूर्ण करते थे. तब से अंग देश के निवासी भगवान् सूर्य की पूजा करने लगे.

द्रौपदी ने भी की थी छठ पूजा. जब पांडव जुए में सब कुछ हार गए थे, तब श्री कृष्ण द्वारा बताये जाने पर द्रौपदी ने छठ पूजा की थी. छठ पूजा के उपरांत इसका फल मिला और पांडवों को अपना राजपाट वापस मिल गया और उन्होंने बहुत लम्बे समय तक हस्तिनापुर पर राज किया.

3. एक अन्य कथा के अनुसार प्राचीन काल में प्रियव्रत नाम के एक राजा थे. उनकी पत्नी का नाम मालिनी था. विवाह के पश्चात बहुत वर्ष बीतने के बाद भी उनका कोई संतान नहीं था. उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए महर्षि कश्यप की मदद से एक बहुत ही बड़ा यज्ञ करवाया. यज्ञ के वरदान के कारण रानी मालिनी गर्भवती तो हुयी परन्तु नौवे महीने में उसने एक मृत शिशु को जन्म दिया. राजा यह देख कर दुखी हुए और अपने शिशु का दाह संस्कार करने के साथ अपना प्राण त्याग करने का फैसला लिया.

उनके इस दुःख को देखकर उसी वक़्त भगवान् की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुयी और कहा की सृष्टी की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण में षष्ठी देवी कहलाती हूँ. मै लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूँ. अगर तुम सच्चे मन से मेरी आराधना करोगे तथा अन्य लोगों को भी मेरी पूजा करने को प्रेरित करोगे तो तुम्हे जरुर संतान की प्राप्ति होगी. यह सुनकर राजा प्रियव्रत ने कड़ी तपस्या की और पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और पुरे विधि-विधान से उनकी पूजा की जिसके फलस्वरूप उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी. यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुयी थी, तभी से छठ का पावन पर्व मनाया जाने लगा.

अक्सर लोगों के मन में ये सवाल रहता है की साल में कितनी बार छठ पूजा होती है? तो मै आपको बता दूँ की छठ पूजा साल में दो बार होती है एक चैत मास में और दूसरा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष, चतुर्थी तिथि, पंचमी तिथि, षष्ठी तिथि और सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है.

छठ पूजा कब है? (Chhath Puja Date)

आप सबके मन में ये सवाल आ रहा होगा की देवछठ(devchhath) festival 2019 में कब है? यानि छठ पूजा 2019 में कब है? तो मै आपको बता दूँ की इस साल छठ पूजा 2019 में 31 अक्टूबर से शुरू होकर 3 नवम्बर को ख़त्म होगा. इस पर्व को चार दिनों तक मनाया जाता है. इन चारों दिनों में श्रद्धालु भागवान सूर्य की अराधना करके वर्षभर सुखी, स्वस्थ और निरोगी होने की कामना करते हैं. सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है. यह वर्ष में दो बार मनाया जाता है. पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में. चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले पर्व को कार्तिक छठ कहा जाता है. सूर्य की शक्तियों का मुख्य स्त्रोत उनकी पत्नी उषा और प्रत्युषा है. प्रातः काल में सूर्य की पहले किरण उषा और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण प्रत्युषा को अर्घ्य देकर दोनों को नमन किया जाता है.

छठ पूजा व्रत विधि (Chhath Puja Vrat Vidhi)

छठ पूजा व्रत विधि में मै आपको बताउंगी की छठ कैसे मनाया जाता है. छठ पूजा में देवी षष्टी माता एवं भगवान् सूर्य को प्रसन्न करने के लिए स्त्री और पुरुष दोनों ही व्रत रखते हैं. छठ व्रत चार दिनों तक चलता है. भैयादूज के तीसरे दिन से यह आरम्भ होता है. व्रत के पहले दिन यानी की कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को “नहाय खाय” होता है. इस साल छठ पूजा की शुरुआत 31 अक्टूबर को नहाय खाय के साथ होगी. मान्यता है की इस व्रत को करने से पहले तन और मन दोनों साफ़ होना चाहिए. इस दिन भक्त नदी में पवित्र स्नान करते हैं और आत्म शुद्धि हेतु केवल अरवा खाते हैं. वे अपने घर के आस पास को साफ़-सुथरा रखते हैं और दिन में एक बार कद्दू-भात भोजन खा कर महापर्व छठ की शुरुआत करते हैं.

कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन “लोहंडा और खरना” होता है. इस बार खरना 1 नवंबर को है. इस दिन भक्त पूरा दिन अन्न और जल त्याग कर उपवास करते हैं और शाम को सूर्यास्त के बाद ही अपना उपवास तोड़ते हैं. स्नान करके पूजा पाठ करके संध्या काल में गुड और नए चावल से खीर बनाकर, चावल का पीठा और घी की रोटी भी बनाकर और मिस्ठान से छठी माता की पूजा की जाती है फिर व्रत करने वाली कुमारी कन्याओं को एवं ब्राह्मणों को भोजन करवाकर इसी खीर को प्रसाद के तौर पर व्रत खोलते हैं. इस खाने में नमक और चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता है.

कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन को छठ का दिन कहा जाता है जो की इस साल 2 नवंबर को मनाया जायेगा. इस दिन घर में पवित्रता एवं शुद्धता के साथ उत्तम पकवान बनाये जाते हैं. प्रसाद के रूप में ठेकुआ का विशेष महत्व है. संध्या के समय इन पकवानों को बड़े बड़े बांस के डालों में भरकर नदी, तालाब, सरोवर के तट पर ले जाया जाता है. नदी के घाट पर सभी भक्त संझिया अर्ध्य या संध्या अर्ध्य भगवान् को चढाते हैं. इसके बाद भक्त अपने परिवार वालों के साथ मिलकर कोसी की रस्म मनाते हैं जिसमे वे पांच गन्ने की छड़ी का घर बनाकर उनपर दिया जलाते हैं. पञ्च गन्ने के छड़ी पंच्तत्व यानि पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष का रूप माना जाता है. व्रत करने वाले जल में स्नान कर इन डालों को उठाकर डूबता सूर्य एवं षष्टी माता को आर्ध्य देते हैं. सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने अपने घर वापस आ जाते हैं.

कार्तिक शुक्ल सप्तमी के दिन उषा “अर्घ्य और परना “दिन कहा जाता है. सप्तमी की तिथि 3 नवंबर को है. इस दिन सुबह सूर्य उगने से पहले नदी के तट पर डालों में पकवान, नारियल, केला, मिठाई भरकर लोग जमा होते हैं. व्रत करने वाले सुबह के समय उगते सूर्य को अर्ध्य देते हैं. अंकुरित चना हात में लेकर षष्ठी व्रत की कथा कही और सुनी जाती है. उसके बाद वे अपना व्रत तोड़ते हैं और छठ प्रसाद ग्रहण करते हैं. विधिवत पूजा पाठ करने के बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है और इस प्रकार इस छठ पूजा का समापन किया जाता है.

छठ पूजा का महत्व (Importance of Chhath Puja in Hindi)

छठ महापर्व में सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है. भगवान् सूर्य देव एक मात्र ऐसे देव हैं जिन्हें हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं. सूरज के प्रकाश से ही पृथ्वी पर प्रकृति का चक्र चलता है. खेती के द्वारा अनाज और वर्षा के द्वारा जल की प्राप्ति हमें सूर्य देव की कृपा से ही होती है. सूर्य षष्ठी की पूजा भगवान् आदित्य के प्रति अपनी श्रद्धा और कृतज्ञता को दर्शाने के लिए ही की जाती है. पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है. लहसुन, प्याज वर्जित होता है. जिन घरों में यह पूजा होती है, वहां छठ गीत गाये जाते हैं और अंत में लोगों को पूजा का प्रसाद दिया जात है. ऐसी मान्यता है की छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है. पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएँ यह व्रत रखती हैं.

यह पूजा करने से धन-धान्य की प्राप्ति होती है तथा जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहता है. यह माना जाता है की छठ पूजा के समय भक्त अपने परिवार से थोडा अलग और साफ़ सुथरी पवित्र जगह में रहता है. पहले दिन के पवित्र स्नान के बाद से वे जमीन पर एक चटाई या कम्बल बिछा के सोते है. एक बार छठ पूजा शुरू करने वाले व्यक्ति को नियम अनुसार प्रति वर्ष पालन करना पड़ता है. इसे किसी वर्ष तभी कोई व्यक्ति पूजा करना बंद कर सकता है जब उस वर्ष परिवार के किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गयी हो.

आज यह पर्व देश और विदेशों में भी मनाई जाती है. धीरे धीरे यह त्यौहार प्रवासी भारतीयों के साथ साथ विश्व भर में प्रचलित हो गया है. हिन्दू संस्कृति के अनुसार सूर्य की कामना एक रोग मुक्त, स्वास्थ्य जीवन की कामना होती है. मुझे उम्मीद है की आपको ये लेख छठ पूजा का इतिहास (History of Chhath Puja in Hindi) पसंद आएगा.

5 COMMENTS

  1. BAHUT SUNDAR CHHAT PUJA LIKHNE KE LIYE , CHHATI MAA KO KATYANI BHI KAHA JATA HAI NAVRATRI ME MAA KSHATI KI PUJA BHI KI JATI HAI

  2. षष्ठी माता को कात्यायनी माता के नाम से भी जाना जाता है नवरात्रि के दिन में हम षष्ठी माता की पूजा करते हैं षष्ठी माता कि पुजा घर परिवार के सदस्यों के सभी सदस्यों के सुरक्षा एवं स्वास्थ्य लाभ के लिए करते हैं मां षष्ठी बच्चों को बहुत प्यार करती हैं यही कारण है बहुत से लोग किसी बिषेश प्रभाव से संतान सुख से वंचित रह जाते हैं वो मां कत्यानी षष्ठी कि पुजा करते हैं
    षष्ठी माता की पूजा , सुरज भगवान और मां गंगा की पुजा देश समाज कि जाने वाली बहुत बड़ी पुजा है । प्राकृतिक सौंदर्य और परिवार के कल्याण के लिए कि जाने वाली महत्वपूर्ण पुजा है । छठ पूजा यानी सुर्य षष्ठी व्रत पुजा पुरा परिवार के स्वास्थ्य के मंगल कामना एवं प्राकृतिक के रक्षा हेतु की जाने वाली महत्वपूर्ण पुजा है । इस पुजा में गंगा स्थान या नदी तालाब जैसे जगह होना अनिवार्य हैं यही कारण है कि छठ पूजा के लिए सभी नदी तालाब कि साफ सफाई किया जाता है और नदी तालाब को सजाया जाता है प्राकृतिक सौंदर्य में गंगा मैया या नदी तालाब मुख्य स्थान है

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