गणेश चतुर्थी पर निबंध

इस लेख में हम आपको गणेश चतुर्थी पर निबंध (Ganesh Chaturthi Essay in Hindi) बताने वाले हैं जहाँ आपको गणेश चतुर्थी की कथा के बारे में बताया जायेगा उसके साथ साथ आपको इस पर्व का महत्व भी पता चलेगा. गणेश चतुर्थी हिन्दू धर्म का सबसे प्रसिद्ध पर्व है जो हर साल भाद्रपाद माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है. इस त्यौहार को पुरे 11 दिनों तक मनाया जाता है जिसे पूरा भारत हर्षौल्लास के साथ मनाता है.

भारत का ये सबसे बड़ा पर्व होने की वजह से इस दिन विद्यालय, दफ्तर, दुकानें इत्यादि सभी बंद रहता है और वे सभी अपने परिवार के साथ मिलकर गणेश चतुर्थी के दिन को धूम धाम से मनाते हैं. लोग बड़े-बड़े पंडाल लगाकर गणेश जी की मूर्ति की स्थापना करते हैं और अपने घरों में भी इनका बड़े ही प्यार से स्वागत किया जाता है. जिस समय से भगवन गणेश घर पर पधारते हैं उसी समय से सारे घर का माहौल भक्तिमय हो जाता है. बच्चे भगवन गणेश जी को ज्यादा पसंद करते हैं क्यूंकि उनका सुन्दर सा गजमुखी रूप सबको लुभाता है. तो चलिए पढ़ते है, गणेश चतुर्थी हिंदी निबंध.

गणेश चतुर्थी पर निबंध (Essay on Ganesh Chaturthi in Hindi)

गणेश चतुर्थी पर निबंध हिंदी में

भगवन गणेश माता पार्वती और भगवन शिव जी के सबसे बड़े पुत्र हैं इन्हें पाने के लिए भगवन शिव और पार्वती दोनों ने तपस्या की थी. गणेश चतुर्थी जिसे विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय त्यौहार है जो भगवन गणेश के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है. भगवन गणेश को 108 विभिन्न रूप से जाना जाता है. व्यापक रूप से इन्हें गणपति या विनायक के रूप में जाना जाता है.

गणेश चतुर्थी को भारत के कई शहरों में मनाया जाता है, महारास्ट्र में इसे बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है. इसे महारास्ट्र का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है. ये केवल हमारे भारत में ही नहीं बल्कि कई दुसरे देशों में भी बड़ी भक्ति और खुसी से मनाया जाता है जैसे थाईलैंड, कम्बोडिया, इंडोनेशिया और नेपाल.

Ganesh चतुर्थी कथा- किस दिन और क्यूँ मनाया जाता है?

गणेश चतुर्थी से जुडी बहुत सी कहानियाँ है लेकिन सबसे प्रसिद्ध कहानी माता पार्वती और भगवन शिव जी से जुडी हुयी है. पौराणिक कथा के अनुसार माना जाता है की देवी पार्वती जी श्री गणेश जी की निर्माता है. गणेश जी शंकर-सुवन और भवानी नंदन है. कथा के अनुसार एक दिन शिवजी गंगास्नान करने के लिए कैलाश पर्वत से भोग्वातिपुरी की और गए. उस दिन माता पार्वती ने अपने शारीर पर लगे चन्दन के उबटन को उतारकर एक बालक का पुतला बनाया जिसमे उन्होंने प्राण डालकर उसे जीवित किया और उस बालक का नाम गणेश रखा.

माता पार्वती को स्नान करना था तो उन्होंने गणेश जी से स्नानघर के दरवाजे की रक्षा करने का दैत्वा सौंपा और उन्हें आदेश दिया की जब तक मै स्नान करके ना लौटूं तब तक स्नान घर के अन्दर किसी को भी आने की इजाजत नहीं देना. गणेश जी अपनी माँ की आज्ञा का पालन करने के लिए द्वार पर जाकर पहरा देने लगे. कुछ समय के बाद जब भगवन शिव जी लौटे तो गणेश जी ने उन्हें अन्दर प्रवेश करने से रोक दिया. शिव जी ने कहा नादान बालक तुम जानते नहीं मै कौन हूँ मै देवी पार्वती का पति हूँ तो तुम मुझे अन्दर जाने से नहीं रोक सकते. गणेश जी को ज्ञात नहीं था की वो इस वक़्त अपने पिता से बात कर रहे हैं और उन्होंने शिव जी को अन्दर जाने की अनुमति नहीं दी.

शिवगणों ने भी गणेश जी को समझाने की बहुत कोशिश की परन्तु गणेश जी ने उनकी बात नहीं मानी और उनसे युद्ध करने लगे परन्तु संग्राम में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सका. ये देख शिव जी को क्रोध आया और उन्होंने अपने त्रिशूल से बालक गणेश का सर धड से अलग कर दिया. गणेश जी की दर्द भरी आवाज़ सुन कर माता पार्वती बाहार आई तो अपने बालक के मृत शरीर को जमीन पर पड़े देख दुःख से रोने लगी. गुस्से में माता पार्वती जी ने शिव जी को अपने पुत्र को फिर से जीवित करने को कहा. उस वक़्त शिव जी को पता चला की वो नादान बालक कोई और नहीं बल्कि उनका ही पुत्र है.

अपने भूल को सुधारने के लिए शिव जी ने नंदी को आदेश दिया की उत्तर दिशा में रखे किसी भी प्राणी का सर काट कर ले आओ. नंदी को हाथी के बच्चे का सर ही उत्तर दिशा में प्राप्त हुआ उन्होंने बिना देरी किये उस गज़ के सर को काट कर शिव जी के पास ले गए. शिव जी ने उस सर को बालक के शरीर से जोड़ दिया और उन्हें जीवनदान दे दिया. गणेश जी के जीवित होती ही माता पार्वती ने उन्हें अपने ह्रदय से लगा लिया.

वहां पर उपस्थित सभी देवी देवताओं ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया की जब भी पृथ्वी लोक में किसी भी नए कार्य की शुरुआत की जाएगी तो वहां पर सबसे पहले गणेश जी की पूजा अर्चना की जाएगी. गणेश जी की आराधना करने वाले मनुष्य के सभी दुःख दूर हो जायेंगे. शिव जी ने वरदान दिया- विघ्न नाश करने में गणेश जी का नाम सर्वोपरी होगा, इसलिए गणेश जी को विघ्नहर्ता गणेश भी कहा जाता है.

गणेश जी को गजानन के नाम से भी जाना जाता है क्यूंकि इनमे हाथी जैसे बुद्धि-बल और धैर्य होता है. इन्हें ज्ञान का देवता, अक्ल का देवता, समृद्धि के देवता और अच्छे भाग्य का देवता भी काहा जाता है जिनकी पूजा करने से घर में सुख, शांति और लक्ष्मी का वास होता है.

गणेश चतुथी के दिन चन्द्रमा को देखना अशुभ क्यूँ माना जाता है?

इससे जुडी भी एक कथा प्रचलित है- एक दिन गणेश जी अपने सवारी मूषकराज के साथ घर लौट रहे थे तो मूषक उन्हें संभाल नहीं पाए और गणेशी जी गिर गए. तभी चन्द्रमा ने भगवन गणेश जी के मोटे पेट का मज़ाक उडाना शुरू कर दिया इससे गणेश जी क्रोधित हो गए और उन्होंने चन्द्रमा को कलंकित होने का श्राप दे दिया की जो कोई भी उन्हें देखेगा उस पर कोई ना कोई बुरा कलंक अवश्य लगेगा. जिसके परिणाम स्वरुप चन्द्रमा काला पड़ गया, इससे भयभीत हो कर चन्द्रमा ने गणेश जी से क्षमा मांगी और उनकी आराधना करनी आरम्भ कर दी. चन्द्रमा की आराधना से खुश होकर गणेश जी ने उन्हें इस श्राप से मुक्त कर दिया सिवाय भादव मॉस की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन के. इस लिए ऐसा माना जाता है की इस दिन जो भी चाँद को देखता है उसके साथ कुछ ना कुछ असुभ जरुर होता है.

गणेश चतुर्थी का महत्व

गणेश चतुर्थी के दिन इनकी सच्चे मन से पूजा अर्चना करने से विनायक जी भक्तों के जीवन के सभी दुखों और परेशानियों को दूर कर देते हैं और उन्हें बुद्धि, कौशल, प्रतिभा, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. इस दिन गणेश जी की कथा पढने या सुनने से मनुष्य का कल्याण होता है और उनकी सभी मनोकामनाएं भी पूरी हो जाती है. जीवन में सुख अवं शांति के लिए गणेश जी की पूजा की जाती है. किसी भी पूजा या कार्य के पूर्व गणेश जी का पूजन एवं आरती की जाती है, तब ही कोई भी पूजा या कार्य सफल मानी जाती है.

गणेश चतुर्थी के दिन भक्तगण भगवन गणेश को अपने घर ले कर आते हैं तथा पूरी आस्था से मूर्ति की स्थापना करते हैं. इस दिन लोग सुबह जल्दी ही स्नान कर साफ़ कपडे पहन कर भगवन की पूजा करते हैं. हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है की जब गणेश जी घर पर आते हैं तो ढेर सारी सुख, समृद्धि, बुद्धि और खुसी ले कर आते हैं और जब वो घर से प्रस्थान करते हैं तो हमारी सारी बाधाएं और परेशानियों को अपने साथ ले जाते हैं. गणेश चतुर्थी का उत्सव 10 दिन तक मनाये जाने के बाद आखरी दिन यानि अनन्त चतुर्दशी पर गणेश जी को धूम धाम से नाच गाकर विसर्जित किया जाता हैं और भगवन से प्रार्थना करते हैं की वो अगले वर्ष फिर से पधारें और अपना आशीर्वाद दें.

मुझे उम्मीद है की आपको ये लेख गणेश चतुर्थी पर निबंध (Essay on Ganesh Chaturthi in Hindi) पसंद आएगा. आशा करती हूँ की आप सभी हर साल की तरह इस साल भी गणेश चतुर्थी का उत्सव उमंग और जोश से अपने दोस्तों और परिवार के साथ मनाएंगे. मेरी तरफ से आप सभी को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें.

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