श्री गणेश चतुर्थी पूजा विधि, महत्व और कहानी

एक भारतीये होने के नाते आपको गणेश चतुर्थी पूजा विधि और गणेश चतुर्थी का महत्व जानना बहुत जरुरी है. गणेश चतुर्थी भारत के सभी पर्वों में से एक बड़ा पर्व है जिसे सभी हिन्दू धर्म के लोग बड़े ही उत्साह और प्रेम से मनाते हैं. लोग इस पर्व का उत्साहपूर्वक इंतजार करते है. ये पर्व भगवन गणेश जी के जन्म के दिन मनाया जाता है. गणेश जी को ज्ञान का देवता, अक्ल का देवता, समृद्धि के देवता और अच्छे भाग्य का देवता भी काहा जाता है जिनकी पूजा करने से घर में सुख, शांति और लक्ष्मी का वास होता है.

भारत में गणेश चतुर्थी सबसे ज्यादा मनाया जाने वाला उत्सव है. पूरे भारत में हिन्दू धर्म के लोग ये मानते है कि हर वर्ष गणेश जी धरती पर पधारते है और लोगों को उनका मनचाहा आशीर्वाद प्रदान करते है। भगवान गणेश हिन्दू धर्म के बहुत प्रसिद्ध ईश्वर है जो भक्तों को बुद्धि और समृद्धि प्रदान करते है. वो लोगों के जीवन से सभी बाधाओं और मुश्किलों को हटाते है साथ ही साथ उनके जीवन को खुशियों से भर देते है. तो चलिए जानते है गणेश चतुर्थी माहिती.

गणेश चतुर्थी पूजा विधि

Ganesh Chaturthi Puja Vidhi

हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार किसी भी शुभ काम को करने से पूर्व गणेश पूजन आवश्यक है. जहाँ पर गणेश जी की पूजा अर्चना होती है वहां पर रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ का वास होता है. जिस घर में गणेश जी की पूजा की जाती है उस घर में गणेश जी की मूर्ति को स्थापित कर पुरे घर को फूलों से सजाया जाता है. वास्तुविज्ञान के अनुसार, जिस घर के मुख्य द्वार पर गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर होती है उस घर में रहने वाले लोगों की उन्नति होती है. तो चलिए जानते है गणेश चतुर्थी व्रत विधि.

गणेश जी की पूजन से पहले पूजा की सामग्री लाएं

गणेश जी को बैठने के लिए चौकी, उस पर बिछाने के लिए लाल कपडा, जल कलश, पंचामृत, चन्दन, गंगाजल, सिंदूर, लाल फूल और फूलों की माला, इत्र, मोदक या लड्डू, गुड और धान, सुपारी, नारियल, फल, पंचमेवा, घी का दीपक, धुप, अगरबत्ती, कपूर इत्यादि.

इन सभी चीजों को बाज़ार से खरीद कर लायें और गणेश जी के पूजा में उपयोग करें. पूजा से पहले गणेश जी को शुद्ध पानी से नहला कर उन्हें फूलों से सजाया जाता है. उसके बाद उनके सामने दीप और अगरबत्ती जला कर आरती की जाती है. ऐसा माना जाता है की पुरे श्रद्धा और साफ़ मन से भजन और मंत्र पढने से मिटटी से बने मूर्ति में भी गणेश जी का वास हो जाता है. और ये भी माना जाता है की इस दौरान गणेश जी भक्तों के घर प्रवेश करते हैं और उनके घरों में सुख, समृद्धि अच्छा भाग्य अपने साथ ले कर आते हैं. गणेश जी की पूजा में मोदक का भोग चढ़ाएं क्यूंकि ये गणेश जी का पसंदीदा मिठाई है इससे वो बहुत प्रसन्न होते हैं.

गणेश चतुर्थी का महत्व

गणेश जी की सच्चे मन से पूजा अर्चना करने से विनायक जी भक्तों के जीवन के सभी दुखों और परेशानियों को दूर कर देते हैं और उन्हें बुद्धि, कौशल, प्रतिभा, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. इस दिन गणेश जी की कथा पढने या सुनने से मनुष्य का कल्याण होता है और उनकी सभी मनोकामनाएं भी पूरी हो जाती है.

गणेश चतुर्थी की कहानी

गणेश पूजन भारत के सभी जगहों पर मनाया जाता है लेकिन Maharashtra में इसे बड़े ही उलास और धूम धाम से मनाया जाता है. गणेश चतुर्थी को मनाने की शुरुआत ही मराठा राज्य काल के राजा छत्रपति शिवाजी ने किया और तबसे ले कर आज तक इसे प्रेम भाव से मनाया जाता है. हिन्दू सभ्यता के अनुसार गणेश जी सबसे प्रथम भगवन के नाम से पूजे जाते हैं. ये उन्नति, खुशाली और मंगलकारी के देवता हैं. किसी भी शुभ कार्य को पूरा करने से पहले गणेश जी की पूजा अवश्य की जाती है.

गणेश चतुर्थी के पीछे एक पौराणिक कथा है जो इनके जन्म से जुडी है. यहाँ में आपको गणेश चतुर्थी व्रत कथा बताने वाली हूँ. एक दिन माता पार्वती स्नान करने के लिए गयी तो दरवाजे पर पहरा देने के लिए माता ने नन्द जी को रखा और उनसे ये कहा की जब तक वो स्नान करके ना आ जायें तब तक किसी को भी अन्दर जाने की इजाजत नहीं देना. इतना कहने के बाद माता स्नान करने चली गयी कुछ समय बाद महादेव शिव जी आये, नन्द जी ने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन महादेव जी ने उनके बातों को अनदेखा किया और अन्दर चले गए. ये देख माता पार्वती बहुत ही क्रोधित हुई और फिर उन्होंने सोचा की इस लोक में महादेव को रोकना किसी के भी बस में नहीं है.

माता पार्वती जी ने निर्णय लिया की उन्हें एक ऐसा द्वारपाल चाहिए जो केवल उनकी ही आज्ञा का पालन करे. इसलिए देवी ने चन्दन के लेप को अपने तन में लगाकर उससे निकले मैल से एक बालक को अवतार दिया और उन्होंने उसका नाम गणेश रखा. गणेश जी को आदेश दिया की उन्हें द्वार पर पहरा देना है और किसी को भी अन्दर आने की अनुमति ना दें चाहे वो खुद महादेव शिव जी ही क्यूँ ना हों. गणेश जी ने माँ की आज्ञा को स्वीकार किया और द्वार पर जाकर खड़े हो गए.

कुछ समय बाद महादेव जी आये तब गणेश जी ने उन्हें अन्दर जाने से रोक दिया. महादेव ने कहा- “दुष्ट बालक तुम जानते नहीं मै कौन हूँ? अगर मुझे अन्दर जाने नहीं दिया तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा”. उनके किसी भी बात से गणेश जी को फर्क नहीं पड़ा और उन्होंने शिव जी को अन्दर जाने से मना कर दिया. इस बात पर शिवगणों ने बालक से भयंकर युद्ध किया परन्तु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका. ये सब देख शिव जी क्रोधित हो गए और अपने त्रिशूल से उस बालक का सर काट दिया. जब अपनी आँखों से देवी पार्वती जी ने गणेश जी को मृत हाल में जमीन पर पड़े देखा तो वो फुट फुट कर रोने लगी और शिव जी पर क्रोधित हो गयी और उन्होंने प्रलय करने की ठान ली.

शिव जी को बाद में ज्ञात हुआ की वो बालक कोई साधारण बालक नहीं था बल्कि उनका ही पुत्र था जिसे देवी ने अपने हाथों से बनाया था और वो केवल अपने माता की आज्ञा का पालन कर रहा था. अपने भूल को सुधारने के लिए उन्होंने देवी से माफ़ी मांगी और उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन पार्वती जी नहीं मानी और शिव जी से कहने लगी- “आप तो देवों के देव महादेव हैं आप किसी भी तरह मेरे पुत्र को फिर से जीवित करिए वरना मै भी यहाँ रो रो कर अपनी जान दे दूंगी”.

यह सुनते ही शिव जी ने नंदी को आदेश दिया- “नंदी तुम्हे उत्तर दिशा की तरह जिस किसी भी जीवित प्राणी का सर मिले उसे काट कर शीघ्र ले आओ”. जब नंदी जी उत्तर दिशा की तरफ रखा हुआ सर ढूंढ रहे थे तो उन्हें कोई भी प्राणी नज़र नहीं आ रहा था सिवा एक हाथी के. तो नंदी जी उस हाथी का ही सर काट कर ले आये. शिव जी ने उस सर को लेकर बालक के शारीर से जोड़ दिया और उन्हें पुनर्जीवित कर दिया. बालक को जीवित देख माता पारवती बहुत प्रसन्न हुयी और उस गजमुख बालक को अपने ह्रदय से लगा लिया.

वहां पर उपस्थित सभी देवों ने गणेश जी को वरदान दिया की पृथ्वी लोक में कोई भी शुभ कार्य करने से पहले मनुष्य गणेश जी की पूजा सर्वप्रथम करेंगे तभी उनका कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण होगा. शिव जी ने वरदान दिया- “विघ्न नाश करने में गणेश जी का नाम सर्वोपरी होगा”, इसलिए गणेश जी को विघ्नहर्ता गणेश भी कहा जाता है.

ऐसा माना जाता है की गणेशी जी का जन्म माघ महीने में हिन्दू चन्द्र के हिसाब से चौथे दिन में हुआ था जिसके लिए गणेश जी का नाम चतुर्थी शब्द के साथ जोड़ा जाता है. इसलिए गणेश जी के जन्म के दिन गणेश चतुर्थी के नाम से उनकी पूजा की जाती है.

गणेश चतुर्थी कब है 2018 में?

भाद्रमास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को पुरे भारत में गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है. इस बार गणेश चतुर्थी का त्यौहार 13 September को है. इस दिन लोग अपने घरों में गणेश जी की स्थापना कर उनका पूजन करते हैं. गणेश चतुर्थी के दिन से इसका उत्सव शुरू होता है और 11वें दिन यानि अनंत चतुर्दशी पर गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ इसका समापन होता है.

गणेश चतुर्थी के दिन सभी घरों और मंदिरों में इनकी पूजा की जाती है जहाँ गणेश जी के भजन प्रेम से गाये जाते हैं. मंदिरों में भक्तों की भीड़ होती है जहाँ लोग गणेश जी के आशीर्वाद के लिए जाते हैं. सभी मुहल्लों और इलाकों में पूजा का आयोजन किया जाता है और पंडाल बनाये जाते हैं जिसमे गणेश जी की बड़ी बड़ी मूर्ति स्थापित की गयी रहती है. उस दिन बच्चे बड़े भी उत्साह और उल्लास से भरे हुए रहते हैं और गणेश जी की पूजा में अपने माता पिता के साथ उपस्थित रह कर भगवन के सामने प्राथना करते हैं.

गणेश चतुर्थी का उत्सव दस दिनों तक मनाया जाता है इसके बाद आखरी दिन में गणेश जी के मूर्ति को विसर्जित करने के लिए सड़क से ले जाया जाता है जहाँ लोग अपने जोश और उमंग को दर्शाते हुए नाचते और गाते हुए ये कहते हुए जाते हैं- “गणपति बप्पा मौर्या!! मंगल मूर्ति मौर्या!!” उसके बाद मूर्ति को नदी और समुद्र में विसर्जित कर गणेश जी से अलविदा ले लिया जाता है.

ये थी गणेश चतुर्थी से जुडी कथा और मुझे उम्मीद है की आपको “गणेश चतुर्थी पूजा विधि और गणेश चतुर्थी का महत्व” के बारे में जानकर आपको ये लेख पसंद आया होगा. छोटे-बड़े, बच्चे-बुद्धे सभी गणेश जी से बेहद प्रेम करते हैं. तो इस साल आप भी अपने घर में गणेश जी को लेकर आईये और उनकी सेवा कर पुण्य कमाने का मौका पाइए. इसके साथ साथ अपने आस पास सफाई का भी ध्यान रखें और ये प्रण लें के इस साल हम सब पर्यावरण के अनुकूल गणेश चतुर्थी के उत्सव को धूम धाम से मनाएंगे.

2 COMMENTS

  1. THANKS SABINA JI. NYC POST YOU WRITE VERY GOOD & WELL ORDERED
    BUT I AM CRAZY FOR SCIENCE SO POST ABOUT RESEARCHES EXPERIMENTS & AND ANYTHING ABOUT SCIENCE

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