मृदा संरक्षण पर निबंध

मृदा संरक्षण पर निबंध: आज हम ऐसे विषय पर बात करेंगे जिसके बारे में बच्चों और लोगों को जागरूक करना बहुत ही जरुरी है. पृथ्वी पर एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन मिट्टी है जो प्रत्यक्ष रूप से वनस्पतियों और धरती पर मानव जीवन तथा पशुओं को अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करती है. मिट्टी मनुष्य जीवन के लिए अमूल्य है.

जैसे हमारे जीवन के लिए हवा और पानी महत्वपूर्ण होता है उसी तरह मिट्टी भी हमारे लिए अति आवश्यक होता है. मिट्टी हमारा और पेड़-पौधों का भरण पोषण करती है. मिट्टी को मृदा भी कहा जाता है. मृदा पृथ्वी की सबसे उपरी परत है जो की जीवन बनाये रखने में सक्षम है.

हम मनुष्य के गलत गतिविधियों के वजह से मृदा नष्ट और दूषित हो रही है जिसका असर केवल धरती पर ही नहीं बल्कि सभी तरह के जिव-जंतु, पेड़-पौधे और मानव जाती पर दिखाई पड़ रहा है. इसलिए मृदा का संरक्षण करना बहुत ही जरुरी है.

कुछ हम मनुष्य के कारण और कुछ प्रकृति के कारण भूमि के ऊपर की सतह की उपजाऊ मृदा नष्ट हो जाती है और अपनी जगह से हट जाती है जिससे मृदा अपरदन (Soil Erosion) की समस्या उत्पन्न होती है जिसके वजह से उपजाऊ ज़मीन भी बंजर बन जाती है. मृदा संरक्षण क्यों आवश्यक है और मृदा संरक्षण के उपाय क्या है? इसके बारे में आज मै इस लेख के द्वारा बताने वाली हूँ- मृदा संरक्षण पर एक निबंध.

मृदा संरक्षण पर निबंध (Essay on Soil conservation in Hindi)

mrida sanrakshan par nibandh
मृदा संरक्षण पर लेख

मिट्टी एक अमूल्य प्राकृतिक संसाधन है, जिस पर संपूर्ण प्राणी जगत निर्भर है. भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहाँ मृदा अपरदन मुख्य समस्या है, मृदा संरक्षण एक अनिवार्य एवं अत्याजय कार्य है. मृदा संरक्षण क्या है? मृदा संरक्षण एक प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत न केवल मृदा की गुणवत्ता को बनाये रखने का प्रयास किया जाता है बल्कि उसमे सुधार की भी कोशिश की जाती है.

मृदा संरक्षण का तात्पर्य उन विधियों से है जो मृदा को अपने स्थान से हटने से रोकते हैं. जल तथा पवन इत्यादि के द्वारा अपरदन एक निरंतर प्राकृतिक प्रक्रिया है. मिट्टी अपरदन या मिट्टी कटाव धरती के ऊपरी मिट्टी को हटा देता है जो कार्बोनिक पदार्थ, पोषक तत्वों, सूक्षम जीवों के लिए जरुरी होता है, जिनके लिए पौधों को बढ़ने और उगने में मदद करता है. संरक्षण एक ऐसा कदम है जो मिट्टी की शक्ति को नष्ट होने से बचाता है.

मृदा अपरदन से होने वाली हानियाँ तो बहुत हैं लेकिन उन सभी समस्याओं में से प्रमुख समस्या यह है की ये कृषि उत्पादन में गंभीर रुकावट पैदा करता है. जिससे देश में अनाज की कमी होती है, इसी के कारण देश में भुखमरी की समस्या भी होती है. मृदा अपरदन की विकरालता एवं उसके फैलाव को कई भौतिक एवं सामाजिक कारक निर्धारित करते है.

प्रमुख भौतिक कारक हैं– वर्षा की अपरदनकारी शक्ति, मृदा की अपनी कटाव क्षमता, आवर्ती बाढ़ों की तीव्रता, ढलान की लम्बाई और तीव्रता. प्रमुख सामाजिक कारक हैं- वनों की कटाई, वनों में आग लगाना, भूमि अपरदन की प्रकृति, खेती करने की विधियां, फसल चक्र रासायनिक खादों का उपयोग और जनसँख्या में बढौतरी.

वनस्पति मिट्टी के अपरदन को कम करती है, इनकी जडें मिट्टी को पकडे रहती है और उन्हें बहने से रोकती है. वनस्पति की एक और विशेषता है की वनस्पति हवा और पानी के वेग को भी रोकती है. इस प्रकार आँधी या बाढ़ों का वेग कम हो जाता है. वनस्पतियों के जडें जल को सोख कर रखती हैं और तने हवा की गति को रोकते हैं.

वनस्पति के नष्ट हो जाने पर हवा मिट्टी को शीघ्रता से काट देती है और पानी ढालों और बहावों के स्थानों की मिट्टी को काट देता है. इस प्रकार उपजाऊ मिट्टी नष्ट होकर नदियों में पहुँच जाती है और गाद (silt) जमा होकर पानी का स्तर ऊपर आ जाता है जो आगे जाकर बढ़ का कारण बनती है.

भूमि को वनस्पति-शुन्य नहीं छोड़ना चाहिए या खेत में कोई वनस्पति ना हो तो उसमे कुछ बो देना चाहिए. कई जगह वर्षा के महीनों में ऐसी फसलें बोई जाती है जो मिट्टी के कटाव को रोकने के साथ साथ मिट्टी को उपजाऊ बनाने का भी काम करती है.

मृदा के संरक्षण में वे सब विधियाँ आती है जिनके द्वारा मृदा अपरदन रोका जाता है. यदि मृदा बह गई है या उड़ गई है तो उसे पुनः स्थापित करना आसान नहीं है. इसके अतिरिक्त मृदा निर्माण एक बहुत ही धीमी प्रक्रिया है. इसलिए मृदा संरक्षण में सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है की मृदा अपने ही स्थान पर सुरक्षित बनी रहे.

संसार के भिन्न क्षेत्रों में मृदा संरक्षण को रोकने के लिए भिन्न-भिन्न विधियाँ अपनाई गई हैं. मृदा संरक्षण की विधियाँ हैं- वनों की रक्षा, वृक्षारोपण, बांध बनाना, भूमि उद्धार, बाढ़ नियंत्रण, पट्टीदार व सीढ़ीदार कृषि इत्यादि.

मृदा संरक्षण के उपाय

मृदा संरक्षण के बहुत सारे उपाय है. इसे कैसे संरक्षण किया जाया इसको ले कर निचे आपको पूरी जानकारी मिलेगा.

1. वन संरक्षण

वृक्षों की जड़ मृदा पदार्थों को बांधे रखती है. वनों की अधिक कटाई के कारण मृदा अपरदन तेज़ी से होता है. यही कारण है की सरकार ने वनों की कटाई पर रोक लगा दी है तथा उन्हें सुरक्षित घोषित कर दिया है. बंजर मृदा, नदी, घाटी तथा पहाड़ों और ढलानों पर पेड़ उगने से मृदा संरक्षण किया जा सकता है.

मृदा संरक्षण की यह विधि सभी प्रकारों के भू-भागों के लिए उपयुक्त है. वनों से वर्षा होती है इनसे मृदा निर्माण की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है. बाढ़ आने से काफी मात्रा में ज़मीन धुल जाती है इस विपदा में पेड़ मृदा अपरदन को रोकते हैं और ज़मीन के ऊपर की मृदा बहने से बच जाती है.

2. बाढ़ नियंत्रण

भारत में मृदा संरक्षण का बाढ़ से काफी नजदीकी सम्बन्ध है. वर्षा ऋतू में नदियों में जल की मात्रा बढ़ जाती है इससे मृदा के अपरदन में वृद्धि होती है. बाढ़ नियंत्रण के लिए नदियों पर बाँध बनाये गए हैं इससे मृदा का अपरदन रोकने के लिए मदद मिलती है. नदियों के जल नहरों द्वारा सूखाग्रस्त क्षेत्रों की ओर मोड़कर तथा जल संरक्षण की अन्य सुनियोजित विधियों द्वारा भी बाढ़ों को रोका जा सकता है.

3. नियंत्रित पशुचारण

अनेक बार मवेशी पशुओं तथा जानवरों के आने जाने चलने से मिट्टी का अपरदन होता है. भूमि की सतह, मवेशी पशुओं तथा बकरियों के खुरों से उबड़ खाबड़ हो जाती है तथा इनके अधिक मात्रा में अनियंत्रित रूप से चरने के कारण मिट्टियों को भरी मात्रा में हानि होती है.

नियंत्रित पशुचारण के द्वारा वनस्पतियों के अत्यधिक चारे से मुक्ति मिलती है और वनस्पतियों में वृद्धि होती है जिससे मृदा का संरक्षण करने में सहायता मिलती है.

4. वृक्षारोपण

वृक्षारोपण मृदा अपरदन में कमी लाता है. वृक्षारोपण द्वारा हम मृदा संरक्षण को प्रोत्साहन दे सकते हैं. वृक्ष ना केवल मृदा की ऊपरी उर्वर परत को जल द्वारा बहाये जाने अथवा हवा द्वारा उडाये जाने से रोकते हैं, बल्कि वे जल के रिसाव की बेहतर व्यवस्था करके मृदा में नमी और जल-स्तर को भी बनाये रखने में सहायक होते हैं.

मरुस्थलीय प्रदेशों के आसपास क्षेत्रों में वृक्षारोपण द्वारा मृदा संरक्षण किया जा सकता है. इसी प्रकार नदी, घाटी, बंजर भूमियों तथा पहाड़ी ढालों पर वृक्ष लगाना मृदा संरक्षण की विधि है. इससे इन स्थानों पर मृदा अपरदन कम हो जाता है.

5. नियोजित चराई

हद से अधिक अत्यधिक चराई से भी पहाड़ी ढालों की मृदा ढीली पड जाती है और पानी का बहाव इन ढीली मृदा को बड़ी आसानी से बहा ले जाती है. मृदा अपरदन रोकने के लिए इन क्षेत्रों में नियोजित चराई से वनस्पति के आवरण को बचाया जा सकता है. इस प्रकार इन क्षेत्रों में मृदा अपरदन को कम किया जा सकता है.

6. समोच्चरेखीय जुताई

मृदा संरक्षण की यह विधि तरंगती भूमि वाले प्रदेशों के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है. भूमि को समान ऊंचाई पर जोतने से हल के कुंड ढाल के आरपार बन जाती है इससे मृदा के अपरदन की गति कम हो जाती है.

ढलान वाले धरातल पर समोच्चरेखीय के साथ साथ बाँध बना कर जुताई की जाती है जिससे अधिक ढाल को धीमे ढाल में बदल दिया जाता है. यह विधि मृदा में उपजाऊपन बनाये रखने में भी सहायक है.

7. पट्टीदार खेती

यह विधि भूमि की उर्वरता (fertility) बढ़ाने तथा अप्रवाह एवं भुक्षरण रोकने हेतु प्रयोग में लायी जाती है. इसके अंतर्गत खेत में पट्टियों पर भूक्षरण अवरोधक फसल लगाई जाती है. इस विधि में खेतो को पट्टियों में बाँट दिया जाता है.

एक पट्टी में एक साल खेती की जाती है जबकि दूसरी पट्टी बिना जोते बोये खाली पड़ी रहती है. छोड़ी गयी पट्टी की वनस्पति का आवरण मृदा अपरदन को रोकते हैं तथा उपजाऊपन को बनाये रखते हैं. अगले वर्ष इस प्रक्रिया को बदल दी जाती है.

8. बाँध बनाना

अवनालिका अपरदन से प्रभावित भूमि में बाँध या अवरोध बनाकर मृदा अपरदन को रोका जा रहा है. यह विधि न केवल मृदा का अपरदन रोकती है अपितु इससे मृदा की उर्वरता बनाये रखने, जल संसाधनों के संरक्षण तथा भूमि को समतल करने में भी सहायता मिलती है.

मृदा हम मानव जीवन के लिए इश्वर द्वारा दिया हुआ वरदान है इसका संरक्षण करना वर्तमान समय की आवश्यकता है. इसका संरक्षण एवं सही उपयोग किया जाना भारत के भविष्य के विकाश के लिए बहुत जरुरी है. जब तक मृदा संरक्षण का महत्व का बोध हम सभी के मन में नहीं होगा तब तक सैद्धांतिक स्तर पर स्थिति में सुधार संभव नहीं होगा. इसलिए हम सबको मिलकर मृदा का संरक्षण करना होगा.

मुझे उम्मीद है की आपको ये लेख “मृदा संरक्षण पर निबंध” पसंद आएगा. इससे जुड़े और सुझाव आप निचे कमेंट में लिख कर हमें बता सकते हैं.

 

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here