गरीब मजदूर पर शोषण रोकने पर निबंध

गरीब मजदूर पर शोषण रोकने पर निबंध: हमारे देश के गरीब मजदूर के हालत से तो आप सभी वाकिफ ही होंगे. मजदुर की परिभाषा क्या है? दुःख, दरिद्रता, भूख, अभाव, कष्ट, मज़बूरी, शोषण और अथक परिश्रम- इन सबको मिला दें तो भारतीय मजदूर की तस्वीरें उभर कर आती हैं. भारतीय मजदूर दो वक़्त की रोटी और अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं.

देखा जाये तो अन्य लोगों के तुलना में सबसे ज्यादा काम मजदुर ही करते हैं लेकिन फिर भी बदले में उन्हें बहुत कम पैसे मिलते हैं. ये उनके साथ एक तरह का शोषण ही तो है जो उद्द्योगपति उनके साथ करते हैं.

इसलिए आज मै इस लेख में आपको “गरीब मजदूरों की समस्या पर निबंध” प्रस्तुत कर रही हूँ जिसमे आपको मजदूरों पर हो रहे शोषण के बारे में और उनके समाधान के बारे में जानकारी भी दूंगी. साथ ही स्कूल के बच्चे भी अपनी आवश्यकता के अनुसार इस निबंध का प्रयोग अपने लिए कर सकते हैं.

गरीब मजदुर पर शोषण रोकने पर निबंध

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मजदूर हमारे समाज का वह भाग है जिस पर समस्त आर्थिक उन्नति टिकी होती है. आज के मशीनी युग में भी उसकी महत्ता कम नहीं हुई है. उद्योग, व्यापार, कृषि, भवन निर्माण, पुल एवं सड़कों का निर्माण आदि सभी क्रियाकलापों में मजदूरों के श्रम का योगदान महत्वपूर्ण होता है.

एक मजदूर देश के निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाता है और उसका देश के विकास में अहम् योगदान होता है. मजदूरों के बिना किसी भी औध्योगिक ढांचे के खड़े होने की कल्पना नहीं की जा सकती. इसलिए मजदूरों का समाज में अपना ही एक स्थान है, लेकिन आज भी देश में मजदूरों के साथ अन्याय और शोषण होता है.

उन्नत देशों के मजदूर और भारत के मजदूर में जमीन आसमान का अंतर है. वहां के मजदुर भी सम्मानित हैं. उसके पास सुख साधनों की कमी नहीं है. उन्नत देशों में मजदूरी बहुत मेहेंगी है. वहां मजदूर कम और काम अधिक है इसलिए बड़े-बड़े पूंजीपति, मालिक और नागरिक मजदूर के इर्द-गिर्द घुमते हैं तथा उन्हें अच्छी मजदूरी देते हैं.

लेकिन भारतीय मजदूर का जीवन घोर परिश्रमी की कहानी है. भारत में मजदूरों की स्थिति अच्छी नहीं है. वह मुँह-अँधेरे जगता है तथा दिन भर हाड़-तोड़ परिश्रम करता है. प्रातः 8 से सायं 5 बजे तक अथक परिश्रम करने से उनका तन चूर-चूर हो जाता है. उसके पास इतनी ताकत कठिनता से बचती है की वह आराम की ज़िन्दगी जी सके.

मजदूरों का शोषण इतना होता है की व मुश्किल से दो वक़्त का भोजन कर पाते हैं. भारत में जनसंख्या इतनी अधिक है की ढेर सारे मजदूर खाली रह जाते हैं. परिणामस्वरुप मजदूरी सस्ती हो जाती है इसलिए पेट भरने योग्य, तन ढकने योग्य और सर छिपाने योग्य मजदूरी नहीं मिलती.

आज बेशक भारत में मजदूरों के 8 घंटे काम करने का संबंधित कानून लागू है लेकिन इसका पालन सिर्फ सरकारी कार्यालय ही करते हैं. देश के अधिकतम प्राइवेट कंपनियां या फैक्ट्रियां अब भी अपने यहाँ काम करने वालों से 12 घंटे तक काम कराते हैं. जो की एक प्रकार से मजदूरों का शोषण है.

मजदूरों से अधिक समय तक काम तो कराते ही हैं लेकिन उसके बदले उन्हें कम मजदूरी दी जाती है. मजदूरों की समस्या का सबसे बड़ा कारण है अज्ञान और अशिक्षा. अधिकांश मजदूर पढ़े-लिखे नहीं होते न ही उनके पास पढाई के लिए धन और अवसर होता है. इस कारण वे अज्ञान, अशिक्षा और अंधविश्वास में जीते हैं.

अज्ञान के ही कारण वो पढ़े-लिखों की दुनिया में ठगे जाते हैं. डॉक्टर उन्हें अधिक मुर्ख बनाते हैं. दूकानदार भी उनसे अधिक पैसे वसूलते हैं. बस या गाडी कहीं भी हो उन्हें सम्मानपूर्वक बैठने भी नहीं दिया जाता. मजदूरी और गरीबी के कारण लोग उनकी घोर अपेक्षा करते हैं. उनका पूरा दिन कमाने-खाने में ही बीत जाता है इसलिए वो अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा भी नहीं पाते. आज भी देश में ऐसे मजदूर हैं जो 1500-2000 मासिक मजदूरी पर काम कर रहे हैं.

इतना ही नहीं कारखानों और केंद्रीय सरकार के लिए काम कर रहे मजदूरों के बिच भी असामनता देखने को मिलती है. वर्ल्ड इकनोमिक फोरम द्वारा 2018 में प्रकाशित “ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट” बताती है की एक ही काम के लिए मजदूरी में असामनता के मामले में भारत 149 देशों में 72वें स्थान पर है. यह अंतर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार देखा जा रहा है.

फैक्ट्रियों में आज भी महिलाओं को पुरुषों के बारबार वेतन नहीं दिया जाता है. जबकी महिलाओं और पुरुषों का काम एक ही होता है फिर भी उनमे वेतन को लेकर असामनता देखने को मिलती है. इनमें ये भेदभाव क्यों? परिश्रम तो दोनों ही बराबर करते हैं, मजदूरों को पता है की ये उनके साथ अन्याय हो रहा है फिर भी वो इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठा पाते क्यूंकि उनका साथ कोई नहीं देता.

हमारे सरकार को महिला श्रमिक से संबंधित कानूनों को सख्ती से लागू करना चाहिए जिससे की महिलाओं को उनका हक़ मिले. और अगर कोई इन कानूनों का उल्लंघन करे तो उसके खिलाफ कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए तभी जाकर मजदूरों के हालात सुधर पाएंगे.

दुनियाभर के मजदूरों को कई श्रेणियों में बाँटा गया है जैसे संगठित और असंगठित मजदुर. संगठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति असंगठित क्षेत्र के मजदूरों से अच्छी है. उन्हें मासिक वेतन, महँगाई भत्ता, पेंशन एवं अन्य सुविधाएं प्राप्त है. उनके काम करने की दशाएँ बेहतर होती है. कार्य के दौरान मृत्यु होने पर उनहें विभाग की ओर से सुरक्षा प्रदान की जाती है ताकि उनका परिवार बेसहारा ना हो.

लेकिन असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की ना केवल मजदूरी कम होती है, अपितु उन्हें किसी भी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा भी प्राप्त नहीं होती. समय दर समय मजदूरों की स्थिति में कुछ सुधर आया तो कुछ मामलों में स्थिति और भी बदतर हुई है. तकनिकी ने लोगों की आव्यशाकता को कम कर दिया है. जो काम पहले सौ मजदुर मिलकर करते थे, वह काम अब एक रोबोट मशीन करने लगी जिससे मजदूरों की जमीन खिसकती चली गयी और लोग बेरोजगार भी होते चले गए.

अपने घर की आर्थिक स्थिति को ठीक करने लिए मजदूर मज़बूरी में अपने बच्चों से भी बाल मजदूरी करवाते हैं. जो उम्र उनके पढने लिखने की होती है उस उम्र में उन्हें मजदूरी के दलदल में धकेल दिया जाता है. बाल मजदूरी बच्चों के मानसिक, शारीरिक, आत्मिक, बौद्धिक एवं सामाजिक हितों को प्रभावित करती है जिससे उनका मासूम सा बचपन उनसे छीन जाता है.

हमारे भारत सरकार ने बाल मजदूरी को खत्म करने के लिए कई कानून बनाये हौं लेकिन उनकी पालना नहीं होने के कारण सड़क के किनारे बने ढ़ाबों, होटलों और कारखानों में आज भी बच्चे बाल मजदूरी कर रहे होते हैं लेकिन कोई भी उनकी तरफ ध्यान नहीं देता है.

भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में शोषण और अन्याय के विरुद्ध अनुच्छेद 23 और 24 को रखा गया है. अनुच्छेद 23 के अंतर्गत खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाया गया है. अनुच्छेद 24 के अंतर्गत 14 साल के कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्ट्री या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जायेगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जायेगा.

कुछ वर्ष पहले की तुलना में यदि मजदूरों की अबकी स्थिति देखें तो उनकी हालत में सुधार होता दिखाई देता है. पहले मजदूरों की स्थिति दयनीय थी. उन्हें पर्याप्त काम नहीं मिल पाता था. जमींदार और बड़े-बड़े किसान उन्हें बंधुआ बनाकर रखते थे. उनसे श्रम अधिक लिया जाता था और पारिश्रमिक कम दिया जाता है. अब बंधुआ मजदूरी समाप्त कर दी गयी है. सरकार की ओर से उनके लिए न्यूनतम मजदूरी की घोषणा की जाती है जिसमे समय समय पर सुधार किया जाता है.

गरीब मजदूरों के लिए प्रांतीय तथा केंद्र सरकार की ओर से समय समय पर कल्याणकारी योजनायों की घोषणा की जाती है. रोजगार गारंटी कार्यक्रम के अधीन ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों के लिए कम से कम सौ दिनों के रोजगार या बेरोजगारी भत्ते की व्यवस्था की गई है. इन कदमो से गरीब मजदूरों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ है.

मजदूरों की दशा में सुधार लाने के लिए अनेक मजदूर संगठन कार्य कर रहे हैं. श्रम से संबंधित मामलों के निबटारे के लिए श्रम न्यायलय खोले गए हैं. बच्चों से काम लेने की प्रथा को क़ानूनी तौर पर समाप्त कर दिया गया है. श्रम संगठनों को अपने हित के लिए आन्दोलन चलाने का अधिकार प्रदान किया गया है. उनके कारण मजदूरों में नई चेतना भी आई है.

इन सबके बावजूद मजदूरों के कल्याण की दिशा में अभी बहुत कुछ करने की आवयश्कता है. वास्तव में हम सोचते हैं की इस तरह की समाज की कुरीतियों को समाप्त करने का दायित्व सिर्फ सरकार का है. सब कुछ कानूनों के पालन एवं कानून भंग करने वालों को सजा देने से सुधारा जायेगा, लेकिन यह असंभव है.

हमारे घरों में, ढ़ाबों में, होटलों में अनेक श्रमिक मिल जायेंगे जो कड़ाके की ठण्ड या तपती धुप की परवाह किये बगैर काम करते हैं. आखिर हमारे अन्दर की इंसानियत कहाँ चली गयी है जो हम मजदूरों पर हो रहे शोषण को बस चुप चाप देखते हैं लेकिन मजदुर का हक़ के लिए आवाज़ नहीं उठाते. हमें इस सवाल का जवाब खुद से ही पूछना होगा.

मजदूरों को रोटी, कपड़ा, माकन दिलाने के लिए अभी लम्बा रास्ता तय करना है. सर्वौत्तम उपाय यही है की मजदुर संगठन और आम आदमी मिलकर शांत तरिकों द्वारा मजदूर के अधिकार के लिए अपनी आवाज़ उठाएंगे तभी देश की संसद उनके हित में नए और बेहतरीन कानून बनाएगी और लागू करवाएगी.

मुझे उम्मीद है की आपको ये लेख “गरीब मजदूर पर शोषण रोकने पर निबंध” पसंद आएगा और साथ ही आपको उन गरीब मजदूरों की अवस्था हमारे देश में क्या है उसके बारे में भी मालूम हो गया होगा. इसलिए आप जब भी मजदूरों का शोषण होते हुए देखें तो उनकी रक्षा के लिए सदैव आगे आयें और उनकी सहायता करें.

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